आर्य मेंशन, मोहाली
“उसकी इतनी हिम्मत कि हमसे,,,, हमसे इस तरह से बात करे। हम उसको बिलकुल भी नहीं बख्शेगे ,,,,, “, आरती खिसियानी बिल्ली जैसे कमरे में इधर उधर घूम घूम कर कुछ कुछ बड़बड़ाये जा रही थी , उसे ये बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं हो पा रहा था कि कल तक उसके इशारो पर नाचने वाले धीरज ने आज उसकी बेइजती करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
वो घूमते घूमते बार बार अपने मोबाइल में किसी का नंबर डायल करती ,फ़ोन कान से लगाती और फिर सकपका कर फ़ोन वापिस हटा लेती , शायद वो किसी को फ़ोन मिलाने की बहुत ही ज्यादा कोशिश कर रही थी मगर फ़ोन लग ही नहीं रहा था।
अब तक आरती काफी फ्रस्ट्रेट हो चुकी थी। मगर फिर भी उसने एक बार फिर नंबर ट्राई किया तो इस बार रिंग चली गयी। उधर से किसी ने फ़ोन उठाया तो आरती चिल्लाते हुए बोली , “किसी काम के नहीं हो तुम लोग , एक काम कहा था वो भी ठीक से नहीं होता , क्या कर रहे हो , बिना बात बस पैसे लिए जा रहे हो , मनाली में इतना कुछ हो गया और मुझे पता भी नहीं ,,,,, कहाँ मर गए थे तुम सब के सब ,,,,,,,अब सुनो मेरी बात,,,,,,,, अब से तुमको मानव और धीरज पर भी नजर रखनी हैं ,समझे ?, मैंने पहले जिसको इस काम पर रखा था वो तो पलटी मार गया , अगर अब तुमने कुछ गड़बड़ की तो अंजाम अच्छा नहीं होगा , समझे तुम ,,,,,,”, और यह कहकर आरती ने फ़ोन काट दिया।
बात करते हुए उसके अंदर का भरा गुस्सा और फ्रस्ट्रेशन, उसके चेहरे पर आते जाते हाव भाव से साफ़ नजर आ रहा था।
फ़ोन रखकर वो खिड़की पर आकर खड़ी हो गयी, फिर एक कुटिल मुस्कान के साथ खुद से ही बड़बड़ाई , “तुमको क्या लगा था धीरज,,,,,अगर तुम नहीं करोगे तो क्या कोई और भी नहीं करेगा मेरा काम ? हम्म ,,,,,,,,,,,,मगर अब जरा बच के रहना तुम मुझसे, क्युकी अब मेरी नजर तुम पर भी हैं धीरज ,,,,,, तुम पर भी “, और यह कहकर वो जोर से हंस पड़ी।
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मनाली
अर्थ अपने कमरे में अभी तक जाग रहा था उसकी तो जैसे नींद ही उड़ चुकी थी , आन्या ने जो कुछ भी उनको बताया था उसको सुनकर उसका मन तुरंत के तुरंत इन्दर से मिलकर, उसे सब सच बताने का कर रहा था , “काश मैं जल्दी से जल्दी सब कुछ ठीक कर पाता, मगर मौसी भी ठीक ही बोल रही हैं , ये दी की अपनी लड़ाई हैं तो उसे खुद ही लड़नी होगी, खुद के लिए खुद ही खड़ा होना होगा , मैं तो बस साथ दे सकता हूँ उनका, वैसे भी क्या पता हम लोगो का बीच में बोलना जीजू को पसंद ना आये, मग़र क्या करू , भाई का दिल हैं , ऐसे दी को उदास और रोता हुआ नहीं देखा जा रहा, कितना दर्द में हैं वो , काश उनका ये दर्द मुझे ही मिल जाता ,,,,,, हे भगवान क्या करू मैं ? “, यह सोच सोच कर अर्थ की आँखें बार बार आंसुओ से भर आ रही थी।
तभी उसके फ़ोन की घंटी बजी , उसने देखा तो आन्या की माँ साध्वी का फ़ोन आ रहा था , “बड़ी माँ ,,,, इस वक़्त ,,,,”, फ़ोन पर नाम देखकर अर्थ ने फटाफट अपने आंसू पूछे और कॉल रिसीव किया , “हेलो , अर्थ , तू कब आ रहा हैं अपनी दी को लेकर ,,,,,हम सब राह देख रहे हैं यहाँ तुम्हारी,,,, “, दूसरी तरफ से बड़ी माँ की आवाज आई तो अचनाक पूछे गए इस प्रश्न पर अर्थ थोड़ा हड़बड़ा गया , “वो,,,,,,वो ,,, “, अर्थ के मुँह से निकला।
“क्या वो, वो ,,,,, कल आ रहे हो ना , तुम्हारे बड़े पापा पूछ रहे हैं ,,,,,”, साध्वी ने हसते हुए अर्थ को बोला तो अर्थ बोला , “नहीं बड़ी माँ , कल नहीं,,,, हम कल नहीं आ पाएंगे,,,,,”
“मगर क्यों ?”, साध्वी ने आश्चर्य से पूछा तो अर्थ कुछ सोचने लगा और फिर बाते बनाते हुए मुस्कुराते हुए बोला , “अरे माँ , जब मैं इतनी दूर आया ही हूँ तो सोचा कि मैं भी थोड़ा घूम फिर लू,,,,,,,,,, फिर आते हैं ना वापिस ,,,,,, वैसे भी रोज रोज कहा होता हैं आना ,,,,,फिर मौसी भी यही बोल रही थी ,,,,,”
“हम्म , वो तो वहां टिक ही गयी थी अब तुमको भेजा उसे लेने तो तुम भी वही टिक गए ,,,,,, चलो कोई नहीं , मैं तुम्हारे बड़े पापा को समझा दूंगी ,,,,ठीक हैं,,,, जाओ अब तुम मजे करो ,,,,”, साध्वी ने अर्थ की बात सुनकर हसते हुए कहा और फ़ोन रख दिया तो अर्थ ने चैन की एक गहरी सांस ली जैसे सोच रहा हो कि , “चलो कम से कम एक मुसीबत तो टली, अब वहाँ से तो कोई बार बार कॉल कर के नहीं पूछेगा आने को,,,,,,”
उधर मौसी भी आन्या के बराबर में बैठी यही सोच रही थी कि कैसे इन्दर और आन्या की जल्द से जल्द बात करवाऊं ताकि उनके बीच की गलतफहमिया हट सके और उनके बीच फिर से वही खूबसूरत रिश्ता कायम हो जाये , वो लगातार आन्या के बालो में अपनी उंगली फिरा रही थी और बार बार उसके मासूम से चेहरे हो देख दुःख से भर जाती थी , “ये तुमने अच्छा नहीं किया मानव ,,,,, तुम इतना नीचे कैसे गिर गए ,,,,,, मेरी बच्ची की बस इतनी सी गलती हो गयी कि उसने ये सोच कर तुमपर विश्वास कर लिया कि तुम भी उसकी ही तरह अच्छे और सच्चे इंसान हो , और उसका कुछ गलत नहीं करोगे ,,,,,,,, मगर तुमने उसे फिर से गलत साबित कर दिया,,,,”, वो मन ही मन बुदबुदाई।
आन्या भी शायद जाग ही रही थी मगर निष्क्रिय सी बिस्तर पर पड़ी हुई थी , उसकी आंखे बंद थी मगर बंद आँखों से भी हलके हलके आंसू निकल कर उसके तकिये को भिगो रहे थे ,,,,,,अब तक शायद उसने भी अपने आंसू और अपनी तकलीफ को छुपाने की कला सीख ली थी।
रंगत चेहरे की मेरे उतर जाएगी ,
बात आते ही जुबा पर रुक जाएगी।
अब कुछ नहीं हो सकता , क्या देर हो गई हैं बहुत ,
कोई दवा क्या ना अब , दिल पर असर कर पायेगी।।
अब वापिस सब कुछ कैसे ठीक करना हैं ये सोच सोच कर उसके दिमाग की नसे सुन्न हुई जा रही थी , “कैसे बात करुँ आपसे , क्या क्या बताऊ आपको ,,,,,,कैसे यकीं दिलाऊं आपको कि मैं सिर्फ और सिर्फ आपसे प्यार करती हूँ ,,,,, अभी तो आपको कुछ भी नहीं पता इन्दर,,,,,,,,कैसे बता पाऊँगी मैं आपको कि उस दिन पार्किंग में भी मेरे साथ कोई और नहीं मानव ही था,,,,,,, हे भगवान् ये क्या कर लिया मैंने,,,,,काश मैंने पहले ही सब कुछ बता दिया होता,,,,,”, अब सिवाए पछतावे के आन्या को कुछ समझ नहीं आ रहा था और यही सब सोच सोच कर उसका दिल भारी हुए जा रहा था।
इधर इन्दर की हालत भी कुछ ठीक नहीं थी , रवि के जाने के बाद वो फिर से अपनी बालकनी में आकर बैठ गया था , वो लगतार अपने दिल को समझा रहा था मगर बार बार उसके दिल की नाराजगी उसकी समझ पर भारी पड़ जाती थी और वो अंदर तक गुस्से और पीड़ा से बिलबिला जाता था।
तुझे मेरी नहीं किसी और की तलाश है ,
ये सोच हमने होंठ ,
सी दिए तो क्या ?
वो जानते हैं कि करते हैं अब भी प्यार उतना ही,
उनपे ना करे ये,
जाहिर तो क्या ?
अभी वो शांत था और लगातार चाँद को देखे जा रहा था , “कितना रश्क था न तुमको मुझसे , लो देखो क्या से क्या हो गया,,,,,,”, उसने चाँद को देखकर मन ही मन सोचा और फिर उदासी में डूबा खुद में ही बुदबुदाया , “तुम कितने शीतल हो,,,, मग़र फिर भी तुममे ये दाग क्यों हैं , या ये केवल हमारी सोच और हमारा तुमको देखने का नजरिया भर हैं ?,,,,,,मुझे पता हैं मेरी आन्या भी तुम्हारी ही तरह शीतल और पाक हैं फिर क्यों ऐसे हालात पैदा हो जाते हैं कि हमारा सोचने का नजरिया बदल जाता हैं ,,,,,,,,क्यों किसी को अपनी सरलता का प्रमाण देना पड़ता हैं, मुझे हर हाल में विश्वास है तुम पर आन्या,,,,,, मगर फिर भी, मैं सब कुछ जानना चाहता हूँ ,,,,,,सब कुछ ,,,,,, मगर तुमने तो सबकुछ ही मुझसे छुपा लिया,,,,,,क्यों ?” , उसकी आँखे आंसुओ से भर आई और उसने अपनी डबडबाती आँखों को कस कर बंद कर लिया तो २-३ बूंदे उसके कोरो को भिगोते हुए उसके गालो पर लुढ़क गयी।
आँखें बंद होते ही , “,,,,,,,,आन्या ने मानव को पीछे से बाहो में भरा हुआ हैं ,,,,,,और उसके कहे वो शब्द ,,,,,,,”, ये सब अचानक ही एकबार फिर से उसके जहन में घूम गया तो हड़बड़ाकर उसने दुबारा अपनी आँखें खोल ली , उसका दिल बहुत भारी हो रहा था और गुस्से से भरी उसकी आँखें आंसुओं से डबडबा रही थी ,,,,, उसने अपने दोनों हाथो से अपने बालो को जकड लिया , फिर लगभग चिल्लाते हुए धीरे से बुदबुदाया,,,,,,,, “क्यों , क्यों , क्यों आन्या , क्यों छुपाया तुमने मुझसे कुछ भी , क्यों ?,,,,वो तुम्हारा अतीत नहीं मग़र जो भी हैं क्यों नहीं बताया मुझे ,,,,, उस दिन पार्टी में भी नहीं,,,,,,क्या इतना भी यकीन नहीं था मुझपर ,,,,,,कितना प्यार करता हूँ मैं तुमसे ,,,,,तुम सोच भी नहीं सकती , तुमसे दूर जाने के बारे में तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता , मगर क्यों इतना दर्द भर दिया तुमने मेरे अंदर ,,,,,, सब कुछ मानूंगा , सब यकीन करूँगा मग़र जो इन आँखों ने देख लिया उसे कैसे भुलाऊ,,,,,,, मेरी बर्दाश्त से बाहर है ये आन्या,,,,,,कैसे करू बर्दाश्त बस ये बता दो,,,,,, “, कहकर इन्दर अपना हाथ अपनी आँखों पर रखकर सिसकने लगा,,,,,
उसके दिल में अथाह पीड़ा हो रही थी मग़र वो किसी को ना तो कुछ बता पा रहा था और न ही बर्दाश्त कर पा रहा था,,,,,,,,फिर कुछ देर अकेले यू ही सिसकते सिसकते जब उसके दिल का गुबार थोड़ा ठंडा हुआ और वो थोड़ा शांत हुआ तो वो अपना मोबाइल खोलकर उसमें अपने और आन्या के साथ अब तक के बिताये पलो की तस्वीरें देखने लगा और अनायास ही उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कराहट आ गयी,,,,, उसने अपने मोबाइल को अपने सीने से लगा लिया और फिर से आँखे बंद करके पीछे टेक लगाकर बैठ गया , आन्या की खिलखिलाती मुस्कराहट , उसकी बातें और उसका वो भोला मासूम चेहरा सब उसके दिमाग में एक पिक्चर की तरह चल रहा था , फिर धीरे धीरे पुरानी यादों में खोये खोये कब उसकी आँख लग गयी उसे खुद पता नहीं चला।
उन सबको देखकर ऐसा लग रहा था जैसे आज की रात सभी के लिए भारी पड़ रही थी। सब शांत तो थे मगर अंदर ही अंदर बहुत ज्यादा टूट चुके थे।।।।
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अगली सुबह –
पार्टी से खाली हाथ लौट आये अपने अधिकारियो पर गुस्सा दिखाते इंस्पेक्टर विक्रम की आँखों में जैसे खून उतर आया था , उसको अपनी ये आखरी योजना भी विफल होती जान पड़ रही थी , “क्या करने गए थे तुम लोग वहां , मजा मस्ती करने या नाचने, तुम लोगो से इतनी सी भी,,,,,,, इतनी सी भी जानकारी हासिल नहीं की गयी , तो क्या खाक केस सॉल्व करोगे ,,,,,,,,इंस्पेक्टर विक्रम नाम हैं मेरा , अगर मेरा मगज घूम जाये , तो हलक में डंडा घुसा कर सब सच उगलवा लेता हूँ मैं,,,,,,,,,” , कहकर इंस्पेक्टर ने सभी को जाने का इशारा किया और फिर से उस केस की फाइल खोल कर पढ़ने लगा।
कहने को इस केस में कुछ भी नहीं था मगर इसी को सॉल्व करने में उनके दिमाग के १२ बज चुके थे, “ये केस जितना आसान मैंने सोचा था उतना हैं नहीं , एक नजर में देखो तो कुछ हैं ही नहीं इस केस में , मगर अब ये इतना कॉम्प्लिकेटेड हो गया हैं , कुछ समझ नहीं आ रहा,,,,और ऊपर से एक ये बंदा पकड़ नहीं आ रहा,,,, “, इंस्पेक्टर विक्रम ने उस स्केच को एक बार फिर से देखते हुए , फाइल को जोर से बंद करते हुए कहा, “लगता हैं आन्या जी से दुबारा मिलना ही पड़ेगा ,,,,, कुछ तो हैं जो उन्होंने छुपाया हैं हमसे ,,,,,,”, इंस्पेक्टर बुदबुदाया और फिर किसी को फ़ोन मिलाने लगा।
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आज की सुबह सभी के लिए ही खास थी , मौसी भी अपने काम जल्दी जल्दी निपटा रही थी और ध्रुव को स्कूल भेजने की तैयारी कर रही थी मगर उनके मन में जल्दी से जल्दी आन्या और इन्दर को मिलवाने की ही योजना चल रही थी। उधर आन्या भी गुमसुम सी उन्ही के साथ किचन में सहायता करा रही थी मगर बिलकुल चुप थी,,,,, मौसी काम करते करते बार बार आन्या को ही देख रही थी मग़र फिर वो भी कुछ बोली नहीं ,,,,,,
कुछ देर बाद वो दोनों घर में अकेली थी,,,,,अर्थ भी वॉक पर गया था ,,,,,,, और ध्रुव भी अपने स्कूल जा चुका था..
“आन्या मुझे कैफे जाना हैं अर्थ भी जायेगा साथ , क्या मैं इन्दर को कॉल करके यहाँ बुला लू , तुम दोनों घर पर अभी अच्छे से बात कर पाओगे,,,,अभी यहाँ कोई होगा भी नहीं तो ये अच्छा मौका हैं आन्या तुम्हारे लिए ,,, बोलो बुला लूँ उसे,,,,,,”, मौसी ने आन्या की ओर देखते हुए पूछा मग़र आन्या ने कोई जवाब नहीं दिया , उल्टा उसकी आँखों में आंसू भर आये और वो मौसी के गले लगकर सिसकने लगी।
“फिर वही ,,,,,,,,क्या हैं ये आन्या ,,,, कितना समझाया तुमको कल ,,,,,, अब देखो बात तो तुमको ही करनी पड़ेगी ,,, और ये ठीक भी हैं , मेरा बोलना उचित भी नहीं होगा ,,,, और शायद इन्दर को पसंद भी ना आये ,,,,,, वो तुमसे नाराज हैं, तो उसकी नाराजगी भी तुमको ही दूर करनी पड़ेगी आन्या,,,,,,”, मौसी ने आन्या को समझाते हुए कहा तो आन्या बोली , “मग़र मौसी मैं अकेले सब,,,,, कैसे ? पता नहीं इन्दर कितना गुस्से में होगा , कैसे सामना कर पाऊँगी उसकी सवालो का ,,,,,,आप भी यही रहो ना प्लीज ,,,,मेरे साथ ही “
“नहीं आन्या बिलकुल भी नहीं , हमारी उपस्थिति में तो कुछ भी बात नहीं हो पायेगी , न तो इन्दर खुल कर बात कर पायेगा और ना तुम सहज हो पाओगी ,,,,,,”, मौसी ने आन्या को साफ़ और स्पष्ट शब्दों में समझाया ,,,,,,,,”और फिर वो इंस्पेक्टर भी कभी भी आ धमकेगा ,,,,,,उससे पहले ही तुम लोगो की बातें हो जाये तो अच्छा ही हैं , वैसे मैं इंस्पेक्टर को फ़ोन करके शाम में आने के लिए बोल दूंगी क्योकि मैं भी तो कैफे से तभी आ पाऊँगी ,,,,,,,तुम्हारे पास आज का पूरा दिन हैं आन्या,,,,,”, मौसी ने फिर से उसपर इन्दर से बात करने के लिए दवाब बनाया ,,,,,,
तभी घर की घंटी बजी तो मौसी बोली , “जाओ गेट खोल दो आन्या, शायद अर्थ आ गया होगा ,,,,,,,” तो आन्या गेट खोलने चली गयी।
गेट खोलते ही अचानक अपने सामने इन्दर को खड़ा देख आन्या एक पल के लिए आश्चर्यचकित ही हो गयी ,,,,,,उसे तो यकीन ही नहीं आया कि इतना कुछ होने के बाद भी इन्दर खुद उससे मिलने आया हैं ,,,,,,या फिर कुछ और बात हैं ,,,,,,ये सोच कर ही आन्या बहुत ज्यादा घबरा गई और उसकी माथे पर पसीने की बूंदे छलकने लगी।
क्रमश :
प्यारे दोस्तों ,
ये पार्ट और इससे अगला पार्ट इन दो पार्ट्स को लिखना मेरा लिए काफी कठिन रहा ,,,,,बार बार लिखती थी और फिर रुक जाती थी ,,,,,, आन्या और इन्दर के दर्द को पन्नो पर उतरना मेरे लिए भी काफी कठिन रहा ,,,,,,,,कई बार लिखते लिखते आँखें नम भी हो गई,,,,,, अपनी तरफ से मैंने पूरी कोशिश की हैं कि उन दोनों के दर्द को आप तक पूरी ईमानदारी के साथ पंहुचा पाऊ ,,,,,,,, मैं कितनी सफल हुई आप मुझे जरूर बताइये ,,,,,,, अगर कुछ त्रुटि रह गई हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ।।।।
धन्यवाद
रूचि जैन