माँ तो बस माँ होती है
कभी हंस देती है
तो कभी अपने आँचल में समेट लेती है
कभी बरसाती है प्यार बेइंतहा
तो कभी सारे गमो को पी लेती है
जो आ जाये गुस्सा तो भी
एक लगा के या तो खुद रो लेती है
या मुस्कुरा के फिर से मना लेती है
लुटा देती है सब कुछ अपना हमारे ऊपर
नोनिहार , दुलार और ढेर सारा प्यार
क्युकी माँ तो बस माँ होती है …
करती रहती है जतन जीवन भर
और हमे यू ही पाल देती है
जो लग जाये किसी की नजर तो
सारी बलाओ को अपने हाथो से ही खुद पर उतार लेती है
कभी कुछ मांगती नहीं और बस देती ही जाती है
फिर अंत में क्यों खुद को इतना अकेला पाती है
बनना है साथी अब उनका इस दौर में
क्युकी वो कभी जतायेगी नहीं
अपने अंदर के सैलाब को बताएगी नहीं
क्युकी माँ तो बस माँ होती है ….
-रूचि जैन