चारो और जश्न का शोर था हर कोई अपने अपने कामो में लगा था , मैं पंडाल की लाइट लगवा रहा था कि तभी किसी ने पीछे से आकर मेरे कंधे पर हाथ रखा
मैंने पलट कर देखा , अरे रमेश तुम , यहाँ कब आये
“आ तो काफी दिन पहले गया था मगर तुमसे बिना मिले वापिस जा न सका ..कैसे हो तुम ” , रमेश ने राघव की ओर मुस्कुराते हुए देख कर पूछा
बहुत खुशी हो रही है ये जान कर की आखिर १८ साल बाद ही सही तुमने आखिर शादी के लिए हाँ कर ही दी … बहुत इंतजार कराया तुमने बिंदिया को ..
इससे पहले की मैं कुछ बोल पाता सामने से कुसुम वहाँ आ गयी
अरे पापा कहा हो आप , कबसे ढूढ़ रही हूँ आपको , जल्दी चलो हल्दी की रस्म होनी है …सब बुला रहे है आपको पापा
और मैं जल्दी जल्दी अपने कदम बढ़ाता उसके साथ अंदर चला गया। रमेश को रुकने का इशारा करते हुए मैंने पीछे मुड़कर पलक झपकाई।
रमेश मेरा सबसे जिगरी दोस्त हुआ करता था कभी।
था तो आज भी मगर अब हम दोनों अलग अलग शहर के हो गए थे और मिले भी बरसो बाद थे।
“अरे रुक तो जा कुसुम, आराम से , चल तो रहा हूँ,” , मैंने मेरा हाथ खींच कर ले जाती हुई कुसुम से मैंने हसकर कहा।
क्या आराम पापा , शादी में इतने काम होते है अगर सब काम आप खुद ही देखोगे तो आपकी शादी में हम क्या करेंगे …., कुसुम ने खिलखिला कर कहा।
आज मैं बहुत खुश हूँ आपके और बिंदिया माँ के लिए—–बहुत खुश हूँ … आज आप दोनों की तपस्या पूरी होने जा रही है …कहते कहते कुसुम की आँखे भर आई .।
अरे पगली तू काहे रो रही है , अगर तू ना होती तो शायद ये तपस्या भी अधूरी ही रह जाती …तेरे कारण ही तो हमारी जिंदगी में ये अवसर आया है .. चल अब रोना बंद कर और सबसे पहले तू मुझे हल्दी लगा … मैंने कुसुम की आँखों के आंसू पूछते हुए कहा ..।
कुसुम ने हमको पटरे पर बिठाया और खूब जी भर के हल्दी लगाई ….चारो और धूम मची थी और हम कुसुम को देख देख कर खुद को बहुत खुशकिस्मत मान रहे थे ..
पूरा दिन ऐसे ही तैयारियों और रस्मो में निकल गया …
सभी रिश्तेदार अपने अपने बिस्तरो में जा चुके थे और मैं अपने कमरे में आ गया
कल मेरी शादी है बिंदिया के साथ, जिसको मैं बहुत प्यार करता था …
१८ साल कैसे बीत गए पता ही नहीं चला … आज भी गोपी काका के बाग़ से आम चुराती बिंदिया और फिर खिलखिलाके वहां से भागती बिंदिया बहुत अच्छे से याद है हमे….
“रुक बिंदिया , कहा भागती है , ठहर जा , सारे आम ख़राब कर दिए , मालिक को क्या जवाब देखगे हम”, बिंदिया के पीछे पीछे भागते काका कुछ कुछ बड़बड़ाये जा रहे थे
आगे आगे बिंदिया और पीछे पीछे काका , पूरे बगीचे का चक्कर लगा कर जब काका थक गए तो एक पेड़ के नीचे बैठ गए , बिंदिया उनके पकड़ में कहा आने वाली थी …
भाग कर बाहर निकलती बिंदिया को देखकर हमने बोला , काहें परेशान करती हो इतना , बिचारे बूढ़े है , कुछ तो सोचा करो
तुमको बहुत प्यार आ रहा है काका पर , और जिसपर आना चाहिए उसको तो तनिक देखते भी नहीं … बिंदिया ने अपनी बड़ी बड़ी आँखें मटका के कहा
बहुत बोल रही है तू हम्म, मेरे पास समय नहीं या तेरे पास नहीं , बोल , मैंने उसका हाथ पकड़कर कलाई मरोड़ते हुए कहा
आह छोड़ो मेरा हाथ, दर्द हो रहा है , अच्छा बाबा मेरे पास नहीं , अब तो छोड़ , बिंदिया ने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा
मैंने थोड़ा पकड़ ढीली करके उसे अपनी और खींचते हुए हंसकर कहा , “समय निकल ले अगर नहीं है तो, कही ऐसा न हो फिर बहुत पछताए बाद में “
“चल हट “, कहकर उसने मुझे धक्का दिया और फिर खिलखिलाते हुए घर की तरफ भाग गई ….
मैं मुस्कुराता हुआ उसे वहाँ से जाते हुए तब तक देखता रहा जब तक वो मेरी आँखों से ओझल न हो गई ….
फिर मैंने अपना ऑटो रिक्शा उठाया और चल दिया काम पर ..
मैं राघव , दिल्ली में एक ऑटो रिक्शा चलाने वाला साधारण सा २३ साल का नौजवान, जिसका इस दुनिया में और कोई नहीं था माँ बाप बचपन में गुजर गए थे फिर चाचा चाची ने जैसे तैसे पाल पोस कर बड़ा किया।
चाचा का कोई बंधा काम तो था नहीं बस एक छोटा सा खेत था उसी से घर का दाना पानी चल रहा था , उनका एक खुद का बेटा भी था रघु जो हमसे १० साल छोटा था ..
शुरू में तो सब ठीक चल रहा था मगर जैसे जैसे हम बड़े हो रहे थे चाची की आँखों में खलने लगे थे ,
“पूरा दिन खा खा के मोटा होता जा रहा है , जाके कोई काम धंधा क्यों नहीं करता … कब तक पलेगा हमारे टुकड़ो पर , यहाँ खुद का सही से पूरा भी नहीं पड़ता ऊपर से इनको भी खिलाओ ” , चाची के ऐसे ऐसे ताने हमको पूरी पूरी रात सोने नहीं देते थे …
फिर एक दिन उन्होंने हमे घर से जाने के लिए कह ही दिया …”जाओ कोई काम ढूढो , अब तभी घुसना घर में जब हमारी हथेली पर कुछ पैसा लाके रखोगे , समझे तुम ” , ये कहकर चाची ने दरवाजा बंद कर लिया…
हमने भी सोच लिया के अब हम भी वापिस न जायेंगे और निकल लिए ट्रैन से दिल्ली के लिए —
आज हमे अपना गाओं छोड़े २ साल हो गए है ….
तभी किसी के हॉर्न ने हमारा ध्यान तोडा। तो हमने अपना ऑटो थोड़ा साइड कर लिया।
“जब चलाना नहीं आता रिक्शा तो चलते क्यों हो , जाने कहाँ कहाँ से आ जाते है दिल्ली में भीड़ बढ़ाने “, कहते हुए एक कार वाला हमारे बराबर से गुजरा।
“ऐसा होना कोई नई बात नहीं थी , ऐसे जुमले हमे पूरे दिन में ७-८ बार सुनने को मिल ही जाते थे , और अब तो हमे आदत भी हो गयी थी , पहले चाची के ताने खाने की और अब यहाँ लोगो से गली खाने की”
हमने थोड़ा आगे लेजाकर ऑटो , स्टैंड पर लगा दी। तभी हमे देख कर हमारा सबसे पक्का दोस्त रमेश वहाँ आ गया।
“अबे साले कहा था तू इतनी देर से ? अब आ रहा है ? टाइम देखा है क्या हुआ है ? ऐसे काम नहीं चलेगा।।। तेरे कारण आज मैंने भी अपनी ३ सवारी छोड़ दी। “, रमेश ने मेरे पास आकर लताड़ते हुए कहा।
“हाँ तो मत छोड़ते न , किसने बोला था छोड़ने को , ये देखो अब हम पर एहसान दिखा रहे है “, मैं थोड़ा गुस्से में था तो वो सारा गुस्सा रमेश पर ही निकल दिया।
“क्या बोला तू हम्म , दुबारा बोल तो “, रमेश ने मेरे सीने पर धक्का देते हुए बोला।
“धक्का ना दो , हम बता रिये है “, मैंने ऊँगली दिखते हुए कहा।
“क्या दिखायेगा बोल , मुझे दिखायेगा , अपने भाई जैसे दोस्त को ? , चल दिखा , दिखा “, कहते हुए रमेश ने हमारा कालर पकड़ लिया।
हम चुप हो गए कुछ नहीं बोले।
“अब क्या हुआ , सब हेकड़ी निकल गयी हम्म “,रमेश ने मेरा कालर छोड़ कर पीछे को धकेलते हुए कहा और वहाँ से हट कर अपने ऑटो में जाकर बैठ गया।
आस पास सारे ऑटो वाले खड़े ये सब देख रहे थे , उनमें से एक बोला “क्या राघव तू भी न फिर से नाराज कर दिया अपने दोस्त को , कितना मरता है वो तेरे लिए।।। सुबह से वेट कर रहा था तेरी और एक तू है की “, कहकर वो और सारे रिक्शा वाले वहाँ से हट कर अपने काम में लग गए।
अब तक तो मेरा गुस्सा भी शांत हो चुका था। अपनी गलती का आभास होते ही मैं रमेश के पास पहुंच गया। वो अपने रिक्शा में बैठ था।
मुझे देखकर उसने पीठ फेर ली।
“माफ़ कर दे न यारा , गलती हो गयी।।। वो किसी और का गुस्सा तेरे पर निकल दिया। “, कहकर मैंने उसे गले लगा लिया।
मोम जैसा दिल था उसका एक दम पिंघल गया , “चल ठीक है ठीक है , ये बता लेट क्यों आया , फिर उस बिंदिया के चक्कर में ना “, रमेश ने मुझे छेड़ते हुए कहा।
“क्या यार तू भी ना “, अपने सर पर हाथ रखते हुए शरमाते हुए मैंने कहा।
“इतना चाहता है तो शादी क्यों नहीं कर लेता उससे , उसकी मौसी बोल रही थी की अगले साल २१ की होते ही हाथ पीले कर देंगी उसके , सोच ले कही देर न हो जाये , तू कहे तो मैं बात करू ?”, रमेश ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
“हाँ हाँ कर लेंगे बात भी , कौनसा मौसी कही भागी जा रही है।।। चल धंधे पर निकलते है। वैसे भी बहुत देर हो चुकी है “, मैंने सर पर चढ़ आये सूरज को देखते हुए कहा।
“चल ठीक फिर मिलते है रात को ८ बजे अपने उसी अड्डे पर “, रमेश भाई ने कहा।
और फिर हम दोनों अपने अपने काम पर निकल गए।
रमेश और मैं दोनों ही दिल्ली के नजदीक ही लगी एक बस्ती में आस पास ही घरो में रहते थे। मेरी ही तरह उसका भी अब कोई नहीं था , एक माँ थी जो पिछले साल ही बीमारी से चल बसी थी। हम दोनों एक उम्र और अकेले होने के कारण बहुत अच्छे दोस्त बन गए थे।
वही बस्ती में बिंदिया भी थी जो अपनी मौसी के साथ वहाँ रहती थी। वो मेरे आने से पहले से वहाँ रह रही थी। ,
जब मैं नया नया दिल्ली आया था तब मेरे पास कोई काम धंधा नहीं था तब कभी कभी बिंदिया की मौसी मेरे पर तरस खाकर खाना दे जाया करती थी। और कभी कभी मैं खुद मौसी से खाना मांग लाया करता था।
बस इसी के चलते मैं और बिंदिया एक दूसरे को पसंद करने लगे थे। ये बात हम दोनों ही जानते थे मगर कहा किसी ने भी एक दूसरे से नहीं।
फिर मेरी मुलाक़ात रमेश से हुई , उसी ने मुझे ऑटो रिक्शा का काम पकड़वाया था। बस तभी से हमारी दोस्ती होते होते पक्के वाली यारी में बदल गयी थी।
मैं इन सब सोच में बैठा ही था की तभी एक सवारी ने मुझे आवाज दी , साउथ – एक्स चलोगे ?
मैंने हामी भरी और चल दिया।
एक के बाद दूसरी फिर तीसरी ऐसे करते करते दिन कब निकल गया पता ही नहीं चला।
रात को वादे के मुताबिक मैं और रमेश , दीनू काका की चाय की दुकान पर मिले , उसे हम अपना अड्डा कहकर बुलाते थे।
वहाँ बैठ कर हम दोनों २-३ चाय पीते और हंस हंस कर एक दूसरे को पूरे दिन के किस्से सुनाते , सच कहो तो हम अपनी सुख दुःख वही मिलकर बांटा करते थे। फिर वो अपने घर चला जाता और मैं अपने।
एक दिन रमेश ने मेरे से बोला , “मौसी मेरे से कल बोल रही थी कि बिंदिया के लिए कोई रिश्ता देखा है। तू जाके उनसे बात कर ना , नहीं तो मेरे से बोल मैं करता हूँ “
“सुनकर मैं थोड़ा सोच में पड़ गया और फिर हाँ में सर हिला दिया “
रमेश ने जाकर मौसी से बात की और किस्मत से मौसी ने हाँ कर दी।
हमारा और बिंदिया का तो जैसे खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था। फिर तो चुपके चुपके कुछ मुलाक़ातों का सिलसिला भी शुरू हो गया।
वो समय हमारी जिंदगी का सबसे खूबसूरत समय था।
फिर एक दिन मौसी बीमार हुई तो उन्होंने घबराकर रमेश से बात करके हमारी शादी की तारीख भी निकलवा ही ली।
शादी की तारीख एक हफ्ते बाद की निकली थी।
मैं खुशी में झूमता हुआ अपनी तैयारियों में मगशूल था कि तभी एक दिन ऐसी घटना घटी जिसने हमारी जिंदगी को पूरा का पूरा बदल के रख दिया।
मैं रात को काम से वापिस लौट रहा था कि तभी मैंने कूड़े के ढेर के पास किसी बच्चे के रोने की आवाज सुनी , वहाँ पर बहुत सारे कुत्ते भी लगातार भौके जा रहे थे।
मैंने अपना ऑटो एक साइड लगा दिया और उधर जाके झांकने लगा।।। मुझे देख कर अब तक सारे कुत्ते भी वहाँ से भाग चुके थे।
मैंने देखा , एक सुन्दर से कपडे में लिपटी एक प्यारी सी नन्ही सी जान कूड़े के ढेर पर पड़ी थी जो रो रो कर दिल्ली के किसी अमीरजादे के कुकृत्ये को ब्यान कर रही थी। मैंने आस पास देखा मगर कोई नजर नहीं आया।
मैंने उस बच्ची को उठा लिया और अपने साथ ले आया।
बच्ची को देख कर बस्ती में सब बाते बनाने लगे।
बिंदिया भी सुनकर मेरे पास भागी चली आई और आंसू भरी आँखों से मेरी ओर देखने लगी।
मैं डर गया कि वो मुझे गलत न सांझ ले इसीलिए मैंने उसे सारी बात बताई। तो वो सब समझ गयी मगर बस्ती वालो को समझाना आसान नहीं था।
वो चाहते थे कि मैं किसी के पाप को वापिस वही फेक आउ जहाँ से लेके आया हूँ।
मगर मैंने साफ़ मना कर दिया।
बिंदिया की मौसी ने बस्ती वालो के चलते बिंदिया से मेरा रिश्ता तोड़ दिया।
मगर बिंदिया ने भी कसम ले ली कि मैं शादी करुँगी तो केवल राघव से और किसी से भी नहीं , वरना कुवारी ही रहूंगी।
मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था की मैं क्या करू।
बिंदिया मेरे पास आई और बोली ,”राघव मैं तुम्हारी हु और तुम्हारी ही रहूंगी।।। मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ , तुमको जो सही लगे वो करो। “
मैंने कहा “मैं इस बच्ची को पाल पोसकर बड़ा करना चाहता हूँ , अब यही मेरा सब कुछ है। “
बिंदिया ने सुना और वहाँ से चली गयी।
मौसी हमारी शादी के सख्त खिलाफ थी और मैंने भी उस बच्ची को बड़ा करने का इरादा कर लिया था तो कही मैं कही चूक न जाऊ इसीलिए मैंने भी बिंदिया से शादी नहीं की।
मैं धीरे धीरे उस बच्ची को बड़ा करने लगा , बिंदिया ने इसमें मेरा बड़ा साथ दिया , दिन में मैं उसे बिंदिया के पास छोड़ जाता था और रात को अपने पास ले आता था।
उसका नाम मैंने कुसुम रखा। अब तो उसी में जैसे मेरी जान बसने लगी थी , बिंदिया भी इस बात को समझ गयी थी इसीलिए उसने भी मुझे कभी शादी करने के लिए जिद नहीं की।
मैंने दिन रात उसके लिए मेहनत की , उसे पढ़ाया लिखाया।।।
फिर एक दिन बिंदिया की मौसी भी चल बसी। अब तक कुसुम १२ साल की हो चुकी थी मगर उसे मेरे और बिंदिया के बारे में कुछ भी नहीं पता था।
वो बिंदिया को दीदी कहकर बुलाती थी।
रमेश ने बोला अब तो मौसी भी नहीं रही है तुम भी बिंदिया से शादी कर लो। मगर मैंने ये कहकर टाल दिया की अब शादी की उम्र है क्या ? कुसुम १२ साल की हो चुकी है क्या सोचेगी वो।
उसे क्या पता की उसका बाप एक कुंवारा बाप है।
फिर एक दिन रमेश भी अपने परिवार को लेकर दूसरे जगह बस गया।
मैं बिलकुल अकेला महसूस करने लगा था
कुसुम भी अब समझदार होने लगी थी …उसको किसी बात का पता न चले इस कारण अब बिंदिया भी मेरे से थोड़ा दूर रहने लगी थी ताकि मैं कुसुम के प्रति अपनी जिम्मेदारी को ठीक से निभा सकू
धीरे धीरे समय बीतने लगा और कुसुम १८ की हो गई ..और कॉलेज जाने लगी।
मैंने अपनी हर कोशिश की की उसे अच्छी शिक्षा दे सकू इसीलिए मैंने उसका एडमिशन भी एक बहुत अच्छे कॉलेज में करा दिया था।
मगर समय को शायद कुछ अलग ही मंजूर था।
एक दिन कॉलेज में जब उसे किसी ने मेरे लिए “कुंवारा बाप ” कहकर पुकारा तो उसे अच्छा नहीं लगा। उसे तो यही पता था की उसकी माँ बचपन में ही मर गयी थी।
उस दिन वो रोते रोते घर आई थी दरवाजा बंद कर लिया था।
आखिर उसे सच्चाई का पता लग ही गया और मेरे और बिंदिया के बारे में भी पता चल गया..
वो सुन रोने लगी और मुझसे बोली “पापा इतनी बड़ी तपस्या मेरे लिए “, और कहकर मेरे से लिपट गयी।
हूँ दोनों की आँख में आंसू थे।
उसने मुझसे बिंदिया से शादी करने के लिए कहाँ तो मैंने मना कर दिया और उसे सारी बात बताई के बस्ती के लोग अब इस बात के लिए राजी नहीं होंगे।
“इस उम्र में अच्छा लगता है क्या ये सब।। अब तुम भी जवान हो रही हो। अब तो तुम्हारी शादी करने के दिन है।।, मैंने बोला।
मगर उसने भी ठान ली हमे एक करके रहेगी … और आखिर कार बस्ती वालो से एक साल की लड़ाई के बाद उसने सबको मना ही लिया …
और कल देखो तो मेरी बिंदिया मेरी हो जाएगी …पूरे १८ साल बाद , मेरी आँखों में आंसू थे ….
मैंने अपनी जिम्मेदारी पूरी की और अब कुसुम कर रही है …
तभी एक आवाज ने मुझे झकझोरा
पापा आप रो रहे हो …
मैंने पलट कर देखा तो कुसुम मेरे पीछे शादी का जोड़ा लेकर खड़ी थी और उसकी आँखों में भी आंसू थे
वो आकर मुझसे लिपट गई और बोली ये दुःख के नही खुशी के
आँसू है पापा ….
बिंदिया माँ और आपकी नयी जिन्दगी की शुरुवात के ख़ुशी के आंसू …..
-रूचि जैन